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धार्मिक प्रतीकों पर बढ़ा विवाद
यूपी राजनीति में धार्मिक उपमाओं से बढ़ी बयानबाजी की गर्मी
धार्मिक प्रतीकों की भाषा से तेज हुई यूपी राजनीति, बयानबाजी ने बढ़ाया नया सियासी विवाद
23 Feb 2026, 02:43 PM
Uttar Pradesh
-
Prayagraj (Allahabad)
Reporter :
Mahesh Sharma
Prayagraj (Allahabad)
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों धार्मिक प्रतीकों और पौराणिक पात्रों के उल्लेख को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। हाल के दिनों में कई राजनीतिक और धार्मिक नेताओं के बयानों में कालनेमि, राहु और रावण जैसे पौराणिक पात्रों का जिक्र होने लगा है, जिससे धार्मिक और राजनीतिक बहस का माहौल बन गया है। यह मुद्दा विशेष रूप से प्रयागराज में आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों और संत समाज से जुड़े विवादों के बाद चर्चा में आया है।
बीते कुछ समय से राज्य में धार्मिक और राजनीतिक बयानबाजी लगातार तेज हो रही है। संत समाज से जुड़े कुछ प्रमुख व्यक्तियों के बयान सामने आने के बाद राजनीतिक दलों ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी है। इसके चलते धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल राजनीतिक संदर्भों में होने लगा है, जिसने विवाद को और गहरा कर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पौराणिक पात्रों के माध्यम से राजनीतिक संदेश देने की परंपरा नई नहीं है, लेकिन हाल के समय में इसका इस्तेमाल ज्यादा खुलकर होने लगा है। कुछ नेता इन प्रतीकों का उपयोग अपने विरोधियों पर निशाना साधने के लिए कर रहे हैं, जिससे राजनीतिक माहौल और अधिक गरमाता जा रहा है।
धार्मिक ग्रंथों में कालनेमि, राहु और रावण जैसे पात्रों को छल, अहंकार और बुराई के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि राजनीतिक भाषणों में इनका उल्लेख करते हुए विरोधियों की आलोचना की जाती है। हालांकि इस तरह की भाषा को लेकर कई सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने आपत्ति भी जताई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चुनावी माहौल में इस प्रकार की बयानबाजी आम हो जाती है, क्योंकि इससे भावनात्मक मुद्दों को हवा मिलती है। इससे समर्थकों को जोड़ने और विरोधियों पर दबाव बनाने की कोशिश की जाती है। लेकिन दूसरी ओर, इससे समाज में अनावश्यक विवाद और तनाव भी बढ़ सकता है।
प्रशासनिक स्तर पर अभी तक इस विवाद को लेकर कोई आधिकारिक कार्रवाई सामने नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। आने वाले समय में यह मुद्दा और अधिक राजनीतिक रंग ले सकता है, क्योंकि राज्य में चुनावी गतिविधियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं।
संत समाज के कुछ प्रतिनिधियों ने कहा है कि धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल सोच-समझकर किया जाना चाहिए, ताकि धार्मिक भावनाएं आहत न हों। वहीं राजनीतिक दलों का कहना है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है।
कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश की राजनीति में धार्मिक और पौराणिक प्रतीकों का बढ़ता इस्तेमाल एक नई बहस को जन्म दे रहा है, जिसका असर आने वाले दिनों में राज्य की सियासत पर साफ तौर पर देखा जा सकता है।
बीते कुछ समय से राज्य में धार्मिक और राजनीतिक बयानबाजी लगातार तेज हो रही है। संत समाज से जुड़े कुछ प्रमुख व्यक्तियों के बयान सामने आने के बाद राजनीतिक दलों ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी है। इसके चलते धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल राजनीतिक संदर्भों में होने लगा है, जिसने विवाद को और गहरा कर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पौराणिक पात्रों के माध्यम से राजनीतिक संदेश देने की परंपरा नई नहीं है, लेकिन हाल के समय में इसका इस्तेमाल ज्यादा खुलकर होने लगा है। कुछ नेता इन प्रतीकों का उपयोग अपने विरोधियों पर निशाना साधने के लिए कर रहे हैं, जिससे राजनीतिक माहौल और अधिक गरमाता जा रहा है।
धार्मिक ग्रंथों में कालनेमि, राहु और रावण जैसे पात्रों को छल, अहंकार और बुराई के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि राजनीतिक भाषणों में इनका उल्लेख करते हुए विरोधियों की आलोचना की जाती है। हालांकि इस तरह की भाषा को लेकर कई सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने आपत्ति भी जताई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चुनावी माहौल में इस प्रकार की बयानबाजी आम हो जाती है, क्योंकि इससे भावनात्मक मुद्दों को हवा मिलती है। इससे समर्थकों को जोड़ने और विरोधियों पर दबाव बनाने की कोशिश की जाती है। लेकिन दूसरी ओर, इससे समाज में अनावश्यक विवाद और तनाव भी बढ़ सकता है।
प्रशासनिक स्तर पर अभी तक इस विवाद को लेकर कोई आधिकारिक कार्रवाई सामने नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। आने वाले समय में यह मुद्दा और अधिक राजनीतिक रंग ले सकता है, क्योंकि राज्य में चुनावी गतिविधियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं।
संत समाज के कुछ प्रतिनिधियों ने कहा है कि धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल सोच-समझकर किया जाना चाहिए, ताकि धार्मिक भावनाएं आहत न हों। वहीं राजनीतिक दलों का कहना है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है।
कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश की राजनीति में धार्मिक और पौराणिक प्रतीकों का बढ़ता इस्तेमाल एक नई बहस को जन्म दे रहा है, जिसका असर आने वाले दिनों में राज्य की सियासत पर साफ तौर पर देखा जा सकता है।
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