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सबूत कमजोर, आरोपी सभी बरी
कोर्ट ने जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल भी उठाए
शराब नीति मामले में केजरीवाल-सिसोदिया को राहत, अदालत ने सबूतों को कमजोर मानते हुए किया बरी
27 Feb 2026, 02:13 PM
Delhi
-
New Delhi
Reporter :
Mahesh Sharma
New Delhi
दिल्ली की चर्चित आबकारी नीति मामले में राउज एवेन्यू अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया समेत सभी आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जांच एजेंसी द्वारा प्रस्तुत किए गए साक्ष्य आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं और कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जांच अधूरी तथा कमजोर दिखाई देती है।
अदालत ने विस्तृत सुनवाई के बाद कहा कि मामले में नीति निर्माण की प्रक्रिया संस्थागत स्तर पर हुई थी और इसमें कई विभागों तथा अधिकारियों की भूमिका रही। दस्तावेजों से यह स्पष्ट हुआ कि नीति तैयार करने से पहले कई स्तरों पर विचार-विमर्श हुआ था। अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी यह साबित नहीं कर सकी कि नीति में किसी व्यक्ति विशेष के हित के लिए बदलाव किया गया था।
फैसले में कहा गया कि अरविंद केजरीवाल के खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए, जिससे यह सिद्ध हो सके कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से आबकारी नीति में हस्तक्षेप किया था। वहीं मनीष सिसोदिया के मामले में भी अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जिससे उनके खिलाफ आरोप साबित किए जा सकें। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि चार्जशीट में कई तथ्यों को स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं किया गया और कुछ आरोप अनुमान पर आधारित प्रतीत होते हैं।
न्यायालय ने जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि कुछ महत्वपूर्ण गवाहों के बयान रिकॉर्ड में शामिल नहीं किए गए और कई गवाहियों में विरोधाभास पाए गए। कुछ आरोप सुनी-सुनाई बातों पर आधारित थे, जिन्हें ठोस साक्ष्य नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि विशेषज्ञों की राय को भी पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया, जिससे जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।
फैसले में यह भी उल्लेख किया गया कि नीति निर्माण प्रक्रिया को आपराधिक साजिश के रूप में साबित करने के लिए आवश्यक प्रमाण उपलब्ध नहीं कराए गए। अदालत ने कहा कि केवल संदेह या आरोप के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि आरोपों को प्रमाणित करने वाले मजबूत साक्ष्य मौजूद न हों।
इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। आम आदमी पार्टी के नेताओं ने इसे न्याय की जीत बताया है, जबकि विपक्षी दलों ने फैसले पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दी हैं। यह मामला लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ था और अब अदालत के फैसले के बाद इसमें नया मोड़ आ गया है।
अदालत के निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि आपराधिक मामलों में आरोप सिद्ध करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक होते हैं। इस फैसले को दिल्ली की राजनीति और न्यायिक प्रक्रिया दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अदालत ने विस्तृत सुनवाई के बाद कहा कि मामले में नीति निर्माण की प्रक्रिया संस्थागत स्तर पर हुई थी और इसमें कई विभागों तथा अधिकारियों की भूमिका रही। दस्तावेजों से यह स्पष्ट हुआ कि नीति तैयार करने से पहले कई स्तरों पर विचार-विमर्श हुआ था। अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी यह साबित नहीं कर सकी कि नीति में किसी व्यक्ति विशेष के हित के लिए बदलाव किया गया था।
फैसले में कहा गया कि अरविंद केजरीवाल के खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए, जिससे यह सिद्ध हो सके कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से आबकारी नीति में हस्तक्षेप किया था। वहीं मनीष सिसोदिया के मामले में भी अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जिससे उनके खिलाफ आरोप साबित किए जा सकें। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि चार्जशीट में कई तथ्यों को स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं किया गया और कुछ आरोप अनुमान पर आधारित प्रतीत होते हैं।
न्यायालय ने जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि कुछ महत्वपूर्ण गवाहों के बयान रिकॉर्ड में शामिल नहीं किए गए और कई गवाहियों में विरोधाभास पाए गए। कुछ आरोप सुनी-सुनाई बातों पर आधारित थे, जिन्हें ठोस साक्ष्य नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि विशेषज्ञों की राय को भी पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया, जिससे जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।
फैसले में यह भी उल्लेख किया गया कि नीति निर्माण प्रक्रिया को आपराधिक साजिश के रूप में साबित करने के लिए आवश्यक प्रमाण उपलब्ध नहीं कराए गए। अदालत ने कहा कि केवल संदेह या आरोप के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि आरोपों को प्रमाणित करने वाले मजबूत साक्ष्य मौजूद न हों।
इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। आम आदमी पार्टी के नेताओं ने इसे न्याय की जीत बताया है, जबकि विपक्षी दलों ने फैसले पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दी हैं। यह मामला लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ था और अब अदालत के फैसले के बाद इसमें नया मोड़ आ गया है।
अदालत के निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि आपराधिक मामलों में आरोप सिद्ध करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक होते हैं। इस फैसले को दिल्ली की राजनीति और न्यायिक प्रक्रिया दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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