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माओवादी नेता ने सरेंडर
वरिष्ठ माओवादी नेता देवजी ने आत्मसमर्पण कर नया रास्ता चुना
वरिष्ठ माओवादी नेता देवजी के आत्मसमर्पण के बाद मुख्यधारा राजनीति में आने के संकेत स्पष्ट हुए
26 Feb 2026, 12:12 PM
Telangana
-
Hyderabad
Reporter :
Mahesh Sharma
Hyderabad
देश में नक्सलवाद के खिलाफ चल रही मुहिम के बीच वरिष्ठ माओवादी नेता देवजी उर्फ थिप्परी तिरुपति का आत्मसमर्पण एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। लंबे समय तक भूमिगत रहकर माओवादी संगठन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले देवजी ने अब मुख्यधारा की राजनीति में आने के संकेत दिए हैं, जिससे इस सरेंडर को और अधिक अहम माना जा रहा है।
करीब 62 वर्षीय देवजी को सुरक्षा एजेंसियों के सामने आत्मसमर्पण के बाद मीडिया के सामने पेश किया गया। इस दौरान वह सामान्य कपड़ों में दिखाई दिए और शांत अंदाज में अपनी बात रखते नजर आए। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने भूमिगत जीवन छोड़ने का फैसला किया है और अब समाज की मुख्यधारा में शामिल होना चाहते हैं।
सूत्रों के अनुसार माओवादी संगठन के वरिष्ठ नेता बसवराजू की मुठभेड़ में मौत के बाद देवजी संगठन के प्रमुख नेताओं में गिने जाते थे। ऐसे में उनका आत्मसमर्पण माओवादी आंदोलन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इससे संगठन की गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।
देवजी ने मीडिया से बातचीत में संकेत दिए कि वह कानून के दायरे में रहकर सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि उनका फैसला किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं बल्कि सामान्य जीवन जीने की इच्छा के कारण लिया गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि नक्सल आंदोलन की विचारधारा सशस्त्र संघर्ष पर आधारित रही है, इसलिए ऐसे नेताओं का लोकतांत्रिक राजनीति की ओर रुख करना एक बड़ा बदलाव माना जाता है। हालांकि मुख्यधारा की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाना आसान नहीं होगा और इसके लिए लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है।
सरकारी योजनाओं के तहत आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को पुनर्वास पैकेज का लाभ भी दिया जाता है। संभावना जताई जा रही है कि देवजी भी इस योजना का फायदा उठा सकते हैं। साथ ही नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास कार्यक्रमों से जुड़कर समाज में सकारात्मक भूमिका निभाने की कोशिश कर सकते हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि देवजी का आत्मसमर्पण नक्सलवाद से लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर बदलाव का संकेत है। यदि वह राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते हैं तो यह नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में नए सामाजिक और राजनीतिक समीकरण पैदा कर सकता है।
सुरक्षा एजेंसियां फिलहाल इस घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं और आगे की गतिविधियों को लेकर सतर्कता बरत रही हैं। देवजी का यह कदम आने वाले समय में नक्सल आंदोलन की दिशा पर असर डाल सकता है।
करीब 62 वर्षीय देवजी को सुरक्षा एजेंसियों के सामने आत्मसमर्पण के बाद मीडिया के सामने पेश किया गया। इस दौरान वह सामान्य कपड़ों में दिखाई दिए और शांत अंदाज में अपनी बात रखते नजर आए। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने भूमिगत जीवन छोड़ने का फैसला किया है और अब समाज की मुख्यधारा में शामिल होना चाहते हैं।
सूत्रों के अनुसार माओवादी संगठन के वरिष्ठ नेता बसवराजू की मुठभेड़ में मौत के बाद देवजी संगठन के प्रमुख नेताओं में गिने जाते थे। ऐसे में उनका आत्मसमर्पण माओवादी आंदोलन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इससे संगठन की गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।
देवजी ने मीडिया से बातचीत में संकेत दिए कि वह कानून के दायरे में रहकर सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि उनका फैसला किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं बल्कि सामान्य जीवन जीने की इच्छा के कारण लिया गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि नक्सल आंदोलन की विचारधारा सशस्त्र संघर्ष पर आधारित रही है, इसलिए ऐसे नेताओं का लोकतांत्रिक राजनीति की ओर रुख करना एक बड़ा बदलाव माना जाता है। हालांकि मुख्यधारा की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाना आसान नहीं होगा और इसके लिए लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है।
सरकारी योजनाओं के तहत आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को पुनर्वास पैकेज का लाभ भी दिया जाता है। संभावना जताई जा रही है कि देवजी भी इस योजना का फायदा उठा सकते हैं। साथ ही नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास कार्यक्रमों से जुड़कर समाज में सकारात्मक भूमिका निभाने की कोशिश कर सकते हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि देवजी का आत्मसमर्पण नक्सलवाद से लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर बदलाव का संकेत है। यदि वह राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते हैं तो यह नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में नए सामाजिक और राजनीतिक समीकरण पैदा कर सकता है।
सुरक्षा एजेंसियां फिलहाल इस घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं और आगे की गतिविधियों को लेकर सतर्कता बरत रही हैं। देवजी का यह कदम आने वाले समय में नक्सल आंदोलन की दिशा पर असर डाल सकता है।
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