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परिवार स्नेह से बनता
गोरखपुर में कुटुंब स्नेह मिलन कार्यक्रम आयोजित
गोरखपुर में मोहन भागवत बोले- भारत की परिवार व्यवस्था स्नेह और संस्कारों पर आधारित
17 Feb 2026, 10:50 AM
Uttar Pradesh
-
Gorakhpur
Reporter :
Mahesh Sharma
Gorakhpur
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने गोरखपुर में आयोजित ‘कुटुंब स्नेह मिलन’ कार्यक्रम में भारतीय परिवार व्यवस्था को लेकर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भारत में परिवार की नींव स्नेह, अपनत्व और भावनात्मक जुड़ाव पर टिकी होती है, न कि किसी कानूनी अनुबंध पर।
अपने संबोधन में उन्होंने स्पष्ट किया कि परिवार केवल एक पुरुष और महिला के साथ रहने से नहीं बनता, बल्कि यह आपसी विश्वास, जिम्मेदारी और संस्कारों से आकार लेता है। उन्होंने विवाह को एक कर्तव्य बताया और कहा कि इसे केवल अनुबंध की दृष्टि से देखना भारतीय परंपरा के अनुरूप नहीं है।
भागवत ने कहा कि परिवार समाज की सबसे छोटी लेकिन सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। यदि परिवारों में मूल्यों और संस्कारों की कमी होती है, तो इसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। उन्होंने युवाओं को पारिवारिक परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।
अपने वक्तव्य के दौरान उन्होंने देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का उदाहरण देते हुए कहा कि जब देश पर संकट आया, तो लोगों ने स्वेच्छा से सोना और कीमती वस्तुएं दान कीं। यह त्याग और समर्पण की भावना परिवार और समाज से ही आती है।
उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में परिवार केवल आर्थिक या सामाजिक संस्था नहीं है, बल्कि यह भावनात्मक सुरक्षा और नैतिक शिक्षा का केंद्र है। परिवारों के सहयोग और संवाद से ही सामाजिक समरसता कायम रह सकती है।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्वयंसेवक और स्थानीय लोग उपस्थित रहे। वक्ताओं ने परिवार संस्था की मजबूती को राष्ट्र निर्माण से जोड़ते हुए कहा कि मजबूत परिवार ही मजबूत समाज और देश की आधारशिला होते हैं।
मोहन भागवत ने अपने संबोधन का समापन इस संदेश के साथ किया कि बदलते समय में आधुनिकता को अपनाते हुए भी पारंपरिक मूल्यों को संजोकर रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि परिवार व्यवस्था को सुदृढ़ रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
अपने संबोधन में उन्होंने स्पष्ट किया कि परिवार केवल एक पुरुष और महिला के साथ रहने से नहीं बनता, बल्कि यह आपसी विश्वास, जिम्मेदारी और संस्कारों से आकार लेता है। उन्होंने विवाह को एक कर्तव्य बताया और कहा कि इसे केवल अनुबंध की दृष्टि से देखना भारतीय परंपरा के अनुरूप नहीं है।
भागवत ने कहा कि परिवार समाज की सबसे छोटी लेकिन सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। यदि परिवारों में मूल्यों और संस्कारों की कमी होती है, तो इसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। उन्होंने युवाओं को पारिवारिक परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।
अपने वक्तव्य के दौरान उन्होंने देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का उदाहरण देते हुए कहा कि जब देश पर संकट आया, तो लोगों ने स्वेच्छा से सोना और कीमती वस्तुएं दान कीं। यह त्याग और समर्पण की भावना परिवार और समाज से ही आती है।
उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में परिवार केवल आर्थिक या सामाजिक संस्था नहीं है, बल्कि यह भावनात्मक सुरक्षा और नैतिक शिक्षा का केंद्र है। परिवारों के सहयोग और संवाद से ही सामाजिक समरसता कायम रह सकती है।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्वयंसेवक और स्थानीय लोग उपस्थित रहे। वक्ताओं ने परिवार संस्था की मजबूती को राष्ट्र निर्माण से जोड़ते हुए कहा कि मजबूत परिवार ही मजबूत समाज और देश की आधारशिला होते हैं।
मोहन भागवत ने अपने संबोधन का समापन इस संदेश के साथ किया कि बदलते समय में आधुनिकता को अपनाते हुए भी पारंपरिक मूल्यों को संजोकर रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि परिवार व्यवस्था को सुदृढ़ रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
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